गौतम बुद्ध का जीवनकाल Gautam Buddha

Gautam Buddha Life Story

Buddha purnima 2018

Gautam buddha गौतम बुद्ध के महान योगी और एक महान तपस्वी के रूप से  आज सारी दुनिया परिचित है , शायद ही ऐसा कोई हो जो बुद्ध को ना जानता हो , या कहींपर उनका नाम ना सुना हो , पर इस महातपस्वी का जीवन काल कैसा था।  अपने जीवन काल में किन किन वस्तुओं ने उन्हें आकर्षित किया ? उन्हें ज्ञान का मार्ग कैसे मिला ? और क्यों वो सारी सुख सुविधाओं को त्यागकर भिक्षु बने? ये सारी बाते मै इस आर्टिकल में करने वाला हु , तो ध्यान से पढ़े। Buddha purnima 2018 .

  • शाक्य कुल के राजा महाराज शुद्धोदन के घर करीब ५६३ इसा पूर्व लुम्बिनी नामक क्षेत्र में  गौतम बुद्ध ने जन्म लिया।  उनकी माता का नाम रानी महामाया था। पर शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था।  गौतम अभी ७ ही दिन के हुए थे के तभी , उनकी माता का देहांत हो गया , इस नन्हे बालक को अब माता के प्रेम की आवश्यकता थी ,जिसे महाप्रजापति गौतमी ने पूरा किया।  महाप्रजापति गौतमी रानी महामाया की सगी छोटी बहन थी , जो नन्हे बुद्ध से बहुत प्रेम करती थी।  सामान्य स्तर पर देखा जाए तो बुद्ध के जन्म लेते ही उनमे कुछ असामान्य से बदलाव थे , जो अन्य बालको में देखने को नहीं मिलते थे।  जैसे बुद्ध के कान, जन्म से ही सामान्य बालको की अपेक्षा लम्बे और आकर्षक थे। उनके जन्म के बाद उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया।  सिद्धर्थ धीरे धीरे बड़ा हो रहा था , वैसे वैसे उनके आंतरिक गुण प्रकट होने लगे थे।  घोड़ो की रेस में जब घोड़े दौड़ते , तो घोड़ो के मुँह से झाग निकलता देख , घोड़े को थका हुआ मानकर वो घोड़े को रोक देता था और जीती हुई बाजी हार जाता था।  सिद्धार्थ को हारना पसंद था पर किसी को कष्ट होता हुआ वो देख नहीं पाता।  उनकी शिक्षा गुरु बिश्वमित्र के यहाँ हुई ,जहाँपर उन्होंने वेदों और शास्त्र मुखोद्गत कर लिए।
  • शिक्षा पूर्ण करने के बाद उनके जीवन में  एक बदलाव आया जिसका नाम था यशोधरा।  केवल १६ वर्ष की आयु में देवी यशोधरा का विवाह सिद्धार्थ के साथ संपन्न हुआ।  सिद्धार्थ के पिता ने ठान लिया था की वो अपने पुत्र को  हमेशा  सुख सुविधाओं में रखेंगे और कभी उन्हें इस संसार के  दुःख नहीं दिखाएंगे।  इसलिए उन्होंने सारे नगरवासियो में हुकुम चलाया की जब कभी हमारे राजकुमार महल से बाहर आये तो उन्हें किसी भी प्रकार का दुःख न देखने को मिले।   यहातक की राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए तीन महल बनवाये , जहाँपर नाच गान और मनोरंजन की सारी सुखसुविधाएं थी। धीरे धीरे उनके वैवाहिक जीवन के चलते बुद्ध के परिवार में एक नन्हे बालक ने जन्म लिया।  जिसका नाम राहुल रखा गया।  इस बदलाव से यशोधरा और राजा शुद्धोधन आनंद से भर उठे।  एक दिन जब बुध्द अपने रथ पर सवार नगर की यात्रा करने के लिए निकले तो उन्होंने सड़क पर एक बूढ़े आदमी को देखा , जिनके बाल पक चुके थे , दांत टूटे हुए और आँखे खोल जा चुकी थी। सिद्धार्थ ने अबतक ऐसे आदमी को नहीं देखा था।  उन्होंने मंत्री से  पूछा के ये कौन है ? इसे क्या हुआ है ? मंत्री ने सारा सच बुद्ध के सामने रख दिया के महाराज ये भी हमारी ही तरह सुन्दर और जवान था , पर वृद्धवस्था के कारन इनकी ऐसी हालत हुई है।  मंत्री की ये बात बुद्ध के मन में घर कर गयी।  दूसरी बार जब वो सैर पर निकले तो उन्हें एक ऐसा आदमी दिखाई दिया जो एक रोगी था।  उसके हाथ पाव ढीले पद चुके थे और दुसरो के सहारे लंगड़ाते हुए वो चल रहा था।  मंत्री से पूछने पर ये सत्य भी बुद्ध के सामने आगया था। तीसरी बार उन्हें एक अर्थी के दर्शन हो गए। इस प्रसंग ने बुद्ध के मन को झगझोड़कर रख दिया।  उनकी रात की नींद भी अब समाप्त हो चुकी  थी , एक दिन उन्हें एक तपस्वी के दर्शन हुए , उस तपस्वी से बुद्ध आकर्षित हो उठे , तपस्वी के मुख पर एक अनोखा तेज था वो एक जीवन्मुक्त योगी की भाती विचरण कर रहा था।  बुद्ध उनके पास गए ,  पूछने पर तपस्वी ने बताया की , मै एक तपस्वी हु ,  मैंने सांसारिक वस्तुओ का त्याग कर दिया है।  बुध्द वापस लौटे , उनके मन में एक कोहराम मचा हुआ था , वो सोचने लगे क्या ऐसा जीवन जो नश्वर  है ,जो कभी ठहरता नहीं , क्या यही जीवन का अंतिम सत्य है ? नहीं मुझे इस परिस्थिति को बदलना है , मुझे उस कारण तक पहुंचना है जो मनुष्य को दुखी करता है ? यही सोच उन्होंने सारी मोह माया को त्यागने का निर्णय लिया और जब रानी यशोधरा और पुत्र राहुल सोये हुए थे , बुद्ध घर से बाहर वन की और चल पड़े। बुद्ध ने आलार कालाम पहुंचकर उद्द्क रामपुत्र से योगसाधना सीखी , ध्यान लगाना , आसन  , समाधि लगाना अदि सीखा।  पर ये सब करने के बाद भी वो संतुष्ट नहीं थे।  बुद्ध अब उरवेला  पहुंच कर तपस्या करने लगे , पहले वो तील और चावल खाकर ही तप करते पर बाद में उन्होंने वो खाना भी छोड़ दिया और निराहार रहकर तपस्या करने लगे , छह वर्ष तपस्या में बीत गए थे , बुद्ध का शरीर अब सिर्फ एक हड्डियों का ढांचा ही रह गया था।

Gautam Buddha Lifetime
Gautam Buddha

  •  तब उनके कानो में एक स्त्री के गायन का स्वर सुनाई दिया जो था की वीणा के तारो को ढीला मत छोडो , ऐसे उसमे से स्वर नहीं निकलेगा , और उसे इतना भी न कसो की तार टूट जाए।  बुद्ध को बात समझ में आ गयी थी।  किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं , समतोल आहार लेने से ही योग सिद्ध होगा ये बुद्ध जान गए थे। अब जल्द ही सिद्धार्थ को अपना लक्ष्य प्राप्त होने वाला था।  एक दिन बुद्ध ध्यान लगाकर वटवृक्ष के निचे बैठे थे।  उसी गांव में एक महिला ने उस वृक्ष से पुत्र होने के लिए मन्नत मांगी थी जिसका नाम सुजाता था।  उस दिन उस स्त्री को एक पुत्र की प्राप्ति हुई और मन्नत पूरी करने के लिए खीर लेकर वो वृक्ष के पास जा पहुंची।  बुध्द के साक्षात् दर्शन पाकर उस स्त्री को लगा जैसे स्वयं वृक्षदेवता ही उसके सामने हो।  विनम्रता पूर्वक उस स्त्री ने वो खीर बुद्ध के चरणों में रख दी। और कहा की जैसे मेरी इच्छा पूर्ण हुई , वैसेही आपकी भी हो , उसी रात बुद्ध के ध्यान लगाने पर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी।  अब सिद्धार्थ बुद्ध बन गए थे , उन्हें सच्चा  ज्ञान प्राप्त हो चूका था।  उस वृक्ष को अब बोधिवृक्ष और उस स्थान को बोधगया नाम से जाना जाता है। 

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