कुण्डलिनी शक्ति kundalini power


कुण्डलिनी शक्ति के बारे में जाने(kundalini meditation)

Introduction And Importance Of Kundali Power

योगशास्त्र ,वेदों ,अघोर तंत्र में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन देखने को मिलता है ,योग के अभ्यास से हमारा शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता ही है ,साथ ही जो आलौकिक और दिव्य शक्तियाँ हमें प्राप्त होती है ,उन सभीका संबंध कुण्डलिनी शक्ति से है। हमारे शरीर में स्थित षट्चक्रों में से मूलाधार चक्र में ये कुण्डलिनी शक्ति सोई हुयी अवस्था में रहती है। तथा निरंतर पवित्रता और योग का अभ्यास करते हुए जब कोई व्यक्ति इसे जगाता है ,तो उसे दिव्य ज्ञान और आलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती है।
कुण्डलिनी शक्ति
Kundalini Shakti

  • कुंडलिनी शक्ति गुदा और लिंग के बिच में उलटी दिशा में योनिमण्डल में स्थित रहती है ,इसका आकार   सर्प की तरह होने के कारण इसे सर्पिणी भी कहा जाता है। ये हमारे शरीर में ठीक वैसे ही स्थित रहती है जैसे कोई साप कुंडली मारकर बैठता है ,इसीकारण ये शक्ति कुण्डलिनी शक्ति के नाम से प्रसिद्ध है। 
  • हर एक मनुष्य के अंदर ये शक्ति वलयाकार रूप में अपनी पूछ को मुँह में दबाकर ,सुषुम्ना नाड़ी को रोककर बैठी रहती है। जब साधक अपनी योगसाधना द्वारा इस शक्ति को जगाता है ,तो ये षट्चक्रों को भेदते हुए ,मूलाधार चक्र से सहस्त्रार चक्र में प्रवेश करती है। साधारणतः ये शक्ति सोई हुयी अवस्था में पायी जाती है ,हमारे शरीर के अंदर तीन विशेष नाड़ियां है। इड़ा,पिंगला और सुषुम्ना ,जब तक हम जीवन जीते है ,तब तक हम केवल दो नाड़ियों द्वारा ही श्वास लेते है ,इन दो नाड़ियों द्वारा प्राणवायु हमारे शरीर में षट्चक्रों को स्पर्श करते हुए प्रवेश करती है। परन्तु जब कुंडलिनी जागरण हो जाता है तो सुषुम्ना नाड़ी सक्रीय हो जाती है जिससे प्राणवायु सीधे चक्रों को भेदकर हमारे शरीर में प्रवेश करने लगती है। 
  • कुण्डलिनी के बारे में योग गुरुओं का सुझाव (kundalini jagran) - प्राचीन काल से ही योग गुरुओं ने कुण्डलिनी शक्ति के बारे में जान लिया था। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में  योगसाधना कर कुंडलिनी शक्ति का अनुभव लिया है। आधुनिक विज्ञानं भी शरीर के अंदर पायी जाने वाली इस  दिव्य शक्ति के होने की पुष्टि करता है ,परन्तु ये शक्ति अदृश्य होने के कारण विज्ञानं इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाता। प्लूटो और पायथागोरस जैसे आत्मदर्शीयों ने कुंडलिनी शक्ति के बारे में कुछ इस तरह अपना अनुभव प्रगट किया है। 
  • "नाभि के पास एक ऐसी दिव्य शक्ति है ,जो साधना द्वारा जगृत होकर मनुष्य के मस्तिक्ष में पहुंच जाती है और तीव्र बुद्धि का विकास करती है ,जिससे मनुष्य अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त करने लगता है ,जिसे कुंडलिनी शक्ति के नाम से जाना जाता है ,जिसके जागरण के बाद मनुष्य परमात्मा के  सूक्ष्म  स्वरुप का दर्शन पाने में सफल हो पाता है और संसार के अनेक चमत्कारी कार्य करने में महारथ हासिल कर लेता है। "
  • इससे एक बात जरूर स्पष्ट होती है, की प्राचीन काल के योगियों को षट्चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण के बारे में हमसे अधिक ज्ञान था ,जो उन्होंने स्वयं अनुभव करके और समाधिद्वारा प्राप्त किया था। ये ज्ञान वो अपने शिष्यों को दिया करते थे ,ताकि इसका सही रूप से प्रसार हो सके। 
  • इस संसार में सभी जिव ,शिव का ही रूप है। इस ब्रम्हांड को चलाने वाली सभी शक्तियां शिव से ही उत्पन्न होती है और शिव में ही विलीन होती है।,शिव ही शक्ति ,और शक्ति ही शिव है ,दोनों को एक दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारा ये शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण है ,शिव ने ही अपनी अनेक शक्तियों से एक दिव्य शक्ति से विश्वरूप धारण किया है,जो मनुष्य के नाभि के पास सूर्यचक्र में स्थित कुंडलिनी शक्ति कहलाती है। 
  • महर्षि पतंजलि के अनुसार सिद्धियां ५ प्रकार की बताई गयी है ,जन्म से ,औषधि से ,तप से ,समाधी से ,और मंत्र से। परन्तु जब साधक ध्यान साधना में अग्रेसर होता है ,तो उसे इन सिद्धियों के पीछे नहीं भागना चाहिए,बल्कि उसका लक्ष्य केवल और केवल उस परमानन्द की प्राप्ति होना चाहिए। 
  • कुंडलिनी शक्ति योग की विशेष सिद्धियों में से एक सिद्धि है,इसका जागरण आसान नहीं है  ,परन्तु  साधक ,गुरु के अनुग्रह और आशीर्वाद से इस शक्ति को जगाने में सफलता प्राप्त कर लेते है। गुरुद्वारा बताये गए मार्ग का अनुसरण करके ,और अष्टांग योग ,यम ,नियम ,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,ध्यान ,धारणा,और समाधी  के ज्ञान और निरंतर अभ्यास के बाद ही कुण्डलिनी शक्ति जागरण में सफलता प्राप्त होती है। 
                                                                                                     
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