May 10, 2018

पंचकोश विज्ञानं क्या है,इसके उगम के बारे में जाने

पंचकोश विज्ञानं क्या है,इसके उगम के बारे में जाने।  मानव शरीर में विभिन्न प्रकार के कोश बने होते है ,जो निरंतर शरीर के आवश्यक कार्यों में लगे रहते है ,उन्हें "पंचकोश "  के नाम से जाना जाता है ,योगसाधना का अभ्यास या ध्यान करते समय साधक को पंचकोश विज्ञानं की जानकारी होना आवश्यक है ,योगसाधना के मार्ग को अपनाकर जब योगी अपने आंतरिक यात्रा की शुरुवात करता है ,तो वो तरह तरह के अनुभवों से गुजरता है। इनमे से अधिकांश अनुभव शरीर में स्थित पंचकोशों से जुड़े हो सकते है। यह आवश्यक नहीं की सभी अनुभव पंचकोश से ही संबंधित हो पर ,बिना पंचकोश विज्ञानं को जाने योगसाधना करना बहुत ही कठिन कार्य है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य को दिव्य ज्ञान प्राप्त करना तो दूर ,अपने शरीर को स्वस्थ रखना भी दुर्लभ हो जाता है। पर पंचकोश विज्ञानं की वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर आप अपने जीवन को सफल बना सकते है ,बस आवश्यकता है तो दृढ़ संकल्प ,सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण की। प्रस्तुत लेख में पंचकोश विज्ञानं क्या है,इसके उगम के बारे में जानकारी देने जा रहे है ,जो आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगी। 




पंचकोश विज्ञानं क्या है,इसके उगम के बारे में जाने



  • हमारा शरीर ५ प्रकार के आवरणों से ढका हुआ है। 
  • अन्नमय कोष 
  • प्राणमय कोष 
  • मनोमय कोष 
  • विज्ञानमय कोष 
  • आनंदमय कोष 
    पंचकोश विज्ञानं







पंचकोश विज्ञानं और उसका उगम  ?

                                              

  • अन्नमय कोष - योग और उपनिषदों में वर्णन किये गए अनुसार एक बार महर्षि भृगु ने अपने पिता वरुण देव से पुछा ,की "हे पिताश्री वह कौनसा आधारभूत शाश्वत नियम है ,जो कभी नहीं बदलता , जो नित्य,सनातन और अटल है। और जिसे ब्रम्ह या चेतना के नाम से जाना जाता है "? कृपा करके मुझे बताये। इस सवाल को सुनकर वरुण देव अपने पुत्र को आदेश देते है की , तुम जाओ और पता लगाकर आओ की वह कोनसा शाश्वत साधन है ,जिससे संसार की  उत्पत्ति ,पालन और विनाश होता है।  पिता का ये आदेश मानकर भृगु तपस्या के लिए वन की और चल पड़ते है। और तपस्या पूर्ण होने पर उत्तर देते हुए कहते है ," इस दुनिया की सभी वस्तुओं का अवलंबन अन्न ही है ,अन्न से ही इस विश्व की उत्पत्ति होती है ,अन्न ही इस दुनिया का पालन करता है ,तथा अंत में सभी वस्तुए भी अन्न में ही विलीन होती है  ,अतः इस संसार का संचालन अन्न के द्वारा ही होता है ".पुत्र के मुख से ये उत्तर सुनकर वरुण देव मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए ,उन्हें इस बात का समाधान हुआ की उनके पुत्र ने इस दुनिया के बाहरी विषयों के सिद्धांतो के बारे में जान लिया है। अगर वैज्ञानिक स्तर पर देखा जाएँ तो ,आज के वैज्ञानिक भी अन्नमय कोष को संसार का संचालक होने की पुष्टि करता है। 
                                       
  • प्राणमय कोष - अन्नमय कोष का रहस्य जान लेने के बाद वरुण देव अपने पुत्र भृगु से कहते है ,की जो रहस्य तुमने जाना है ,उस रहस्य से भी सूक्ष्म रहस्य इस धरती पर अदृश्य अवस्था में व्याप्त है ,तुम जाओ और उस सूक्ष्म रहस्य का पता लगाकर आओ। पिता की ये बाते सुनकर भृगु फिरसे सत्य खोजने निकल पड़ता है। सत्य का पता लगाकर जब भृगु वापस आते है ,तो पिता से कहते है " की जिसके कारण स्थूलरूपी अन्नमय कोष की उत्पत्ति हुयी ,उसे प्राण तत्व कहा जाता है।  शरीर का प्राण प्रभाव संतुलित रहने से ही ,अन्नमय कोष स्वस्थ रहता है ,शरीर के भीतर फैली हुयी नाड़ियों में प्राण प्रवाहित होता रहता है ,जिसकारण शरीर अपनी क्रियाओं को संपन्न कर पाता है। "अपान " प्राण की अधोगामी शक्ति है जिसके कारन शरीर में मल ,मूत्र,प्रसव, रजोधर्म,स्खलन इत्यादि क्रियाये संपन्न होती है। श्वास और प्रश्वास की क्रिया को प्राण कहा जाता है। "उदान" प्राण का संबंध शरीर में उलटी अदि क्रियाये कराना है। समान प्राण का उपयोग ,प्राण और अपान को संतुलित बनाये रखने में होता है। तंत्रिका का ज्ञान, रक्तसंचार ,तथा सभी कोशिकाओं की कोशिकीय प्रकिया को संचालित करने का कार्य "व्यान प्राण " द्वारा किया जाता है। 




  • मनोमय कोष -प्राणमय कोष का ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद वरुण फिरसे भृगु को तप करने के लिए भेज देते है ,तप पूरा होने पर भृग अपने पिता से कहते है ,पिताश्री मै जान गया हु की सभी वस्तुओं का साधन ,और सुख और दुःख का एकमात्र कारण मनुष्य का मन ही है। इसीको मनोमयकोश कहा जाता है ,मन का वर्णन ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ही ग्रहण किया जाता है और उसका उत्तर भी उसीके द्वारा दिया जाता है। विचार के द्वारा मन किसी बात का निरीक्षण करता है ,विचार मन को नाना प्रकार के वर्णनों में लगा देता है। मन विचारों के वश में होकर लालसा ,कामना ,भावना ,इच्छा,पाने या ना पाने की मनोमयकोश के इस इन्द्रिय को भावना का केंद्र कहा जाता है। इसका आधार मैं या अहम भाव का होना है। मन में उत्पन्न तनाव जब प्राणमयकोश और अन्नमयकोश में चला जाता तब शरीर में रोग आदि उत्पन्न होने लगते है ,इसलिए कहा जाता है की जिस व्यक्ति का मन साफ़ होता है ,उसे किसी और साधना की आवश्यकता नहीं पड़ती। 


  • विज्ञानमय कोष - इसप्रकार अपनी खोज के बारे में बताकर महर्षि भृगु ने ,पिता वरुण को प्रसन्न कर दिया ,पुत्र की सफलता को देखकर वरुण देव कहते है ,की हे पुत्र तुम अपने जीवन की सही दिशा की और अग्रेसर हो रहे हो ,इसीप्रकार अपनी खोज को आगे बढ़ाओ ,पिता के ये वचन सुनकर भृगु फिरसे खोज करने निकल जाते है। पुनः लौट आनेपर भृगु अपने पिता से कहते है ,की हे गुरुवर्य मैंने अपनी अंतिम खोज पूर्ण कर ली है ,मै जान गया हूँ,की इस समस्त संसार को  केवल विज्ञानमय कोष ही संचालित करता है ,वास्तव में मन की दो भावनाये है ,एक है अच्छी भावना और दूसरी बुरी भावना ,जैसी अगर आपके मन में किसी वास्तु को प्राप्त करने की इच्छा है ,किसी भी कीमत पर आप उसे पाना चाहते है ,वो वस्तु अगर आप किसीके पास देख ले,और आपके मन में बुरी भावना आ जाए की ये वस्तु मैं उससे चोरी छुपे ले लूंगा ,और जैसे ही आप उस वस्तु को लेने जाते हो ,आपकी अंतरात्मा आपको रोकती है ,की ऐसा मत करो ,ये अच्छा कार्य नहीं है ,इसीको विज्ञानमय कोष कहते है। मानव की तुलना में ये भावना पशु में कम देखने को मिलती है ,इसीलिए मानव और पशु में अंतर किया जाता है। 





  • आनंदमय कोष - विज्ञानमय कोष की खोज करने के पश्चात भृगु फिरसे तप करने निकल जाते है ,पर इस बार वो वापस नहीं आते ,इस घटना से वरुण देव चिंतित हो जाते है और भृगु से मिलने चले जाते है ,वह जाने पर वो देखते है की भृगु परमानन्द में डूबा हुआ है ,भृगु के अंदर से अहंकार पूर्ण रूप से मिट चुका था ,उन्हें अब सत्य का ज्ञान हो चूका था की इस संसार में केवल आनंद ही एकमात्र आधारभूत तत्व है। इन पंचकोशों में से क्रमश अन्नमय से प्राणमय ,प्राणमय से मनोमय ,मनोमय से विज्ञानमय और विज्ञानमय से आनंदमय कोष सूक्ष्म होता है। 


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