समाधी samadhi

समाधी से पूर्णत्व की प्राप्ति Ashtang Yoga Samadhi In Hindi

Introduction And Benefits Of Samadhi In Ashtang Yoga 

अष्टांग योग में समाधी को ही योग का आठवां अंग मना गया है ,जब साधक धारणा और ध्यान का अभ्यास पूर्ण कर लेता है ,तब वो समाधी अवस्था के लिए योग्य माना जाता है। समाधि के लिए व्यक्ति का मन और दिमाग पूर्ण रूप से शून्य होने चाहिए ,किसी प्रकार का बाहरी विचार समाधी में अडचण पैदा कर सकता है। इसलिए योगशास्त्र में समाधी से पहले धारणा और ध्यान के अभ्यास को बताया है। जब ध्यान का अभ्यास करते हुए चित्त निर्मल और विचार शून्य हो जाते है ,तब उस अवस्था में समाधी घटित होती है।
samadhi in hindi
Samadhi

  • जब साधक ध्यान का अनुभव ले लेता है ,तो वो अपनी अंतर आत्मा में लीन हो जाता है। वो केवल ईश्वर की दिव्य शक्ति को ही अनुभव करने लगता है। उसे अपने अंदर के दोष साफ साफ दिखाई देने लगते है ,फिर वो किसी और का परीक्षण नहीं बल्कि अपने आप का आकलन करने में लग जाता है। वास्तव में जब साधक धारणा का अभ्यास पूर्ण कर लेता है ,तभी उसके विचार शून्यत्व को प्राप्त कर लेते है। जब धारणा सिद्ध हो जाती है ,तब साधक ध्यान का अभ्यास करता है तो वो पूर्ण रूप से अपने आपको परमात्मा में लीन कर लेता है। जब वो ध्यान में सफलता प्राप्त कर लेता है ,तो वो समाधि की और अग्रेसर हो जाता है। जब समाधि घटित हो जाती है ,तो साधक के अंदर समत्व उजागर होने लगता है ,और वो पूर्ण रूप से ईश्वर में लीन हो जाता है ,उसके लिए ना कोई अपना रहता है ,ना कोई पराया ,ना कोई अच्छा और ना ही कोई बुरा,वो हर एक प्राणी को समानता की दृष्टी से देखने लगता है ,उसे हर प्राणी में केवल ईश्वर ही दिखाई देता है। समाधि में व्यक्ति परम आनंद के शिखर को प्राप्त कर लेता है,उसके शरीर में एक अनोखा तेज छलकने लगता है। समाधि में लीन होने के बाद व्यक्ति को कुछ भी याद नहीं रहता ,मै कौन हु ?,कहासे आया हु ?वो केवल अपनी अंतरात्मा में ही लीन रहता है। 
  • समाधि का अर्थ -  समाधि घटित हो जाने पर कुण्डलिनी शक्ति का जागरण हो जाता है ,जो मनुष्य के नाभि के पास सूर्य चक्र में निद्रित अवस्था में रहती है।  योगसाधना द्वारा जब ये कुंडलिनी जाग जाती है ,तो ये शरीर में स्थित सभी षट्चक्रों को भेदते हुए,साधक के मस्तिक्ष में आ पहुँचती है ,जिससे सभी षट्चक्र जागृत होकर तीव्र बुद्धिमत्ता और एकाग्रता की प्राप्ति होती है। 
  • हमारे शरीर में दिनभर अनेक क्रियाएं चलती रहती है ,लेकिन हमें इस बात का पता नहीं चल पाता,जैसे जब हम भोजन ग्रहण करते है तो वो क्रिया हमारे सामने घटित होती है ,पर भोजन के पचने  की क्रिया हमारी जानकारी के बिना ही संपन्न हो जाती है। ऐसी अनेकों क्रियाएं हमारी जानकारी के बिना ही संपन्न हो जाती है।  पर साधक जब साधना करता है ,तो इस साधनाद्वारा वो अपनी हृदय की गति को भी नियंत्रित कर सकता है। भोजन का पचना और ना पचना सब उसके वश में हो जाते है। 
  • समाधि योग का अंतिम रूप है। समाधि में सफलता तब प्राप्त होती है ,जब साधक ध्यान करते हुए अपने मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर अपनी अंतरात्मा में लीन करने के काबिल बन जाता है। 
  • समाधि प्राप्त हो जाने पर साधक को  रस,रूप,गंध,स्पर्श ,शब्द इन ५ वस्तुओं की इच्छा नहीं रहती ,वो इन सब बातों से परे हो जाता है। इस अवस्था में साधक को भय ,चिंता ,लाभ ,हानि ,मान,अपमान इन सब भावनाओं की अनुभूति नहीं होती। उसकी प्रज्ञा स्थिर हो जाती है ,और वो स्थितप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त कर लेता है। 
                                                                                                       
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