Shatchakra In Hindi Complete Guide

Shatchakra In Hindi Complete Guide योगशास्त्र में शरीर के अंदर रहनेवाले सात विभिन्न प्रकार के चक्रों का वर्णन किया गया है। जिन्हे षट्चक्रों के नाम से जाना जाता है। ये चक्र शरीर के भीतर सूक्ष्म रूप में रहते है ,प्रत्येक मनुष्य पर इन चक्रों में से किसी एक ना एक चक्र का प्रभाव अवश्य रहता है ,जिससे वो उस चक्र के गुणों के अनुसार लाभ प्राप्त करता है। इस लेख में आपको Shatchakra In Hindi की संपूर्ण जानकारी देने का प्रयास करेंगे ,जो आपके लिए काफी मददगार साबित होगी।


  • शरीर में स्थित ऊर्जा चक्रों के नाम
  • मूलाधार चक्र 
  • स्वाधिष्ठान चक्र 
  • मणिपुर चक्र 
  • अनाहत चक्र /हृदय चक्र 
  • विशुद्ध चक्र 
  • आज्ञा चक्र 
  • सहस्त्रार चक्र 



Shatchakra In Hindi - शरीर में स्थित षट्चक्रों का परिचय और लाभ

Shatchakra In Hindi - शरीर में स्थित षट्चक्रों का परिचय और लाभ
Shatchakra
  • Names And Benefits Of Shatchakra

  • मूलाधार चक्र 
  1. शरीर के भीतर जिस दिव्य शक्ति के बारे में योगग्रंथों में कहा गया है ,उसे कुंडलिनी शक्ति कहा जाता है। 
  2. कुंडलिनी शक्ति सभी प्राणियों के भीतर निद्रित अवस्था में रहती है ,जिस स्थान पर ये रहती है उसे मूलाधार चक्र कहा जाता है। 
  3. इस चक्र के नाम में ही इसके गुणों का वर्णन किया गया है। इस चक्र को विश्व का मूल माना जाता है। इसका स्थान मनुष्य के जनेन्द्रिय और गुदा के बिच होता है। यही चक्र ब्रम्हांड की उत्पत्ति ,पालन और लय का कारक है।
  4.  ये चक्र पृथ्वी तत्व का बोधक है , मूलाधार चक्र का रंग लाल होता है ,इस चक्र का जागरण होने पर साधक को ४ पखुड़ियों वाले कमल का अनुभव होता है। 
  5. इस चक्र के आदिदेव श्री गणेश है ,इस चक्र में स्थित चार पंखुड़ियों वाला कमल ,पृथ्वी की चारों दिशाओं की और संकेत करता है। 
  6. यहापर कमल की ४ पंखुड़ियों का मतलब ,४ विशेष नाड़ियों से है जो आपस में मिलकर कमल का रूप ले लेती है। 
  7. मूलाधार चक्र का जागरण होने पर ,इस चक्र में से चार प्रकार की ध्वनिया निकलती है ,जो हमारे ह्रदय और मस्तिक्ष को कंपित करती है। 
  8. उन ध्वनियों को ध्यान पूर्वक सुननेपर वो -वं,शं,शं,सं जैसी सुनाई पड़ती है। मूलाधार चक्र को रस,रूप ,गंध,भाव ,शब्द ,और बुद्धि का स्वामी माना जाता है। 
  9. मनुष्य के मल, मूत्र, वीर्य,प्रसव, आदि क्रियाये इसी चक्र के अधीन रहती है। अगर किसी व्यक्ति में इन गुणों की अधिकता पायी जाए तो समझ लेना चाहिए की ,वह व्यक्ति मूलाधार चक्र से प्रभवित है।


  • स्वाधिष्ठान चक्र 

  1. ये चक्र मूलाधार के ठीक ४ उंगलिया ऊपर और नाभि के ३ अंगुलिया निचे है ,मूलाधार चक्र का जागरण हो जाने पर साधक की ऊर्जा स्वाधिष्ठान चक्र की और बढ़ने लगती है। 
  2. इस चक्र का जागरण होने पर साधक को ६ पखिड़ियों वाले कमल की अनुभूति होती है ,तथा ६ प्रकार की कंपित ध्वनिया - वं,भं ,मं,यं,रं,लं  निकलती रहती है। 
  3. Swadhishthana Chakra  का सीधा संबंध चन्द्रमा से है जो मन का कारक है ,इसी चक्र के कारण प्रजनन क्रिया संपन्न हो पाती है ,इस चक्र को जल तत्व का कारक माना गया है। 
  4. हमारे शरीर में ७० प्रतिशत जल की मात्रा होती है ,इस जल तत्व का संपूर्ण नियंत्रण स्वाधिष्ठान चक्र द्वारा किया जाता है। 
  5. इस चक्र के जागरण से व्यक्तिविकास होता है ,इस चक्र को मनोरंजन का केंद्र भी माना जाता है ,इसलिए जिन लोगोंपर इस चक्र का अधिक प्रभाव रहता है ,वो ज्यादातर अपना जीवन मनोरंजन में ही बिताना पसंद करते है ,इन लोगों का मन अति कोमल और इनकी भाषा अति मधुर होती है। 


  • मणिपुर चक्र 

  1. मणिपुर चक्र का स्थान हमारे नाभि में जहाँपर ७२००० नाड़ियों का मिलन होता है,वहापर होता है। 
  2. मणिपुर चक्र में अग्नि तत्व प्रधान है ,इस चक्र में साधक को १० पंखुड़ियों वाले नीले रंग के कमल की अनुभूति है। यह १० प्रकार की ध्वनिया - डं,धं,टं,थं,दं,धं,नं,पं,फं,बं  जैसी ध्वनिया निकलकर नाड़ियो को कंपित करता है। 
  3. यह चक्र हमारे शरीर में नाभि से लेकर ह्रदय तक के भाग को नियंत्रित करता ,.जो भोजन हम करते है ,उसे रस,रक्त,मांस में परिवर्तित करने का कार्य मणिपुर चक्र के द्वारा ही किया जाता है। 
  4. इस चक्र का जागरण होनेपर पेट संबंधित सभी समस्याएं दूर हो जाती है। 
  5. मणिपुर चक्र पर नियमित ध्यान लगानेपर साधक की भावनाये शांत होकर शरीर का भौतिक ज्ञान प्राप्त होता है। 


  • अनाहत चक्र /ह्रदय चक्र  

  1. ये चक्र ह्रदय में स्थित होता है इसलिए इसे ह्रदय चक्र भी कहा जाता है।अनाहत चक्र का रंग सफ़ेद होता है ,इस चक्र का जागरण होनेपर साधक को १२ पंखुड़ियों वाले कमल की अनुभूति होती है ,इस चक्र के अधिष्ठाता देव श्री विष्णुजी को माना गया है। 
  2. अनाहत चक्र में से १२ प्रकार की ध्वनिया ,ह्रदय से कंठ तक के भाग को कंपित करती रहती है। 
  3. वायु तत्व प्रधान होने के कारण ,प्राणवायु संबंधित सभी कार्य अनाहत चक्र नियंत्रित करता है। 
  4. जैसे अन्न पचाना,रक्त बनाना ,वायु को सभी आवश्यक अंगों तक पहुँचाना ,वीर्य बनाना ,पसीने के द्वारा पानी को बाहर निकालना इत्यादि कार्य Anahata Chakra के द्वारा ही किये जाते है। 
  5. अनाहत चक्र का जागरण होने पर साधक को सभी शास्त्र और विद्याओं का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जिन लोगों में वाक्पटुता ,योगकला में निपुण और काव्यामृत रचनेवाले, इत्यादि गुण देखने को मिले तो समाज लेना चाहिए की ये अनाहत चक्र से प्रभावित है। 



  • विशुद्ध चक्र  

  1.  विशुद्ध चक्र  मनुष्य के कंठ में स्थित होता है ,तथा साधक को १६ पंखुड़ियों वाले कमल के समान अनुभूति होती है। 
  2. इस चक्र का रंग भूरा होता है और इस चक्र में आकाश तत्व की प्रधानता होती है ,इसलिए जब साधक विशुद्ध चक्र पर अपना ध्यान केंद्रित करता है ,तो उसका मन आकाश की तरह शून्य होता चला जाता है।
  3.  विशुद्ध चक्र  का ध्यान करने से मनुष्य सभी प्रकार की भय ,चिंता ,शोक, रोग को दूर कर लंबी आयु को प्राप्त कर लेता है। 
  4. इस चक्र का जागरण होने पर साधक को दिव्य दृष्टी ,दिव्य ज्ञान और कल्याणकारी भावना की प्राप्ति होती है। 



  • आज्ञा चक्र  


  1. आज्ञा चक्र के अधिष्ठाता देव स्वयं भगवान् शिव को माना गया है ,इस चक्र का रंग सुनहरा होता है। आज्ञा चक्र का स्थान दोनों भौओं के बिच होता है। 
  2. मूलाधार चक्र  से लेकर विशुद्ध चक्र तक कुंडलिनी  इड़ा  पिंगला और सुषुम्ना इन तीन अलग अलग नाड़ियों में प्रवाहित  होती रहती है। 
  3. परंतु आज्ञा चक्र में आकर ये तीनों नाड़ियां आपस में मिल जाती है ,जिसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। 
  4. वैज्ञानिकों के अनुसार इसी स्थान पर पीनियल ग्रंथि और पिट्यूटरी ग्रंथि का मिलन होता है। 
  5. योगशास्त्र में आज्ञा चक्र का विशेष महत्त्व बताया गया है ,इस चक्र को समस्त पापों का नाश करनेवाला माना गया है ,जो साधक इस त्रिवेणी संगम में अपने मन को स्नान कराता है ,उसके मन के सभी विकार मिट जाते है।


  • सहस्त्रार चक्र  


  1. सहस्त्रार चक्र को जागृत कर लेना ही साधक का परम लक्ष्य होता है। 
  2. इस चक्र का स्थान ब्रम्हरंध्र में सबसे ऊपर, जहाँपर हमारी शिखा होती है ,ठीक वही होता है। 
  3. सहस्त्रार चक्र के रंगों का वर्णन करना आसान नहीं है ,अनेक प्रकार के इन्द्रधनुष्यों के समान इस चक्र का रंग होता है। इस चक्र का जागरण करने पर साधक को अनेक पंखुड़ियों के कमल की अनुभूति होती है।
  4. सहस्त्रार चक्र का जागरण होने से हमारे दिमाग के वो भाग ,जो जीवन भर बंद पड़े रहते है वो आकस्मिक ही खुल जाते है ,जिससे साधक वो सब चीजे देखने लगता है ,जो या तो उसके पूर्वजन्म से निगडित होती है, या तो उसके दिमाग का हिस्सा होती है। 
  5. पूर्ण रूप से सहस्त्रार चक्र का जागरण हो जाने पर ये सब चीजे दिखाई देना बंद हो जाती है ,अब साधक के लिए कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता ,वो सर्व सिद्धियों से युक्त हो जाता है। 
  6. खेचरी सिद्धि से साधक अपने मन को वश में कर लेता है। साधक की तीसरी आँख खुल जाती है और वो असंम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त कर लेता है।                                                                                                                    


इस लेख में आपको "Shatchakra In Hindi" के बारे में जानकारी मिली ,चक्र जागरण का सबसे बड़ा और सहज साधन गुरुकृपा है। गुरु के आशीर्वाद से ही आप पूर्ण रूप से चक्र जागरण कर सकते है। 
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