Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?


Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?

"Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?" योग में वर्णित "सूर्य नमस्कार" एक संपूर्ण योगमुद्रा है। जो सूर्य के प्रति समर्पित भाव को प्रगट करती है।

प्राचीन समय से ही लोग सूर्य की उपासना करते आये है। सूर्य से ही सभी का जीवन जुड़ा हुआ है , पेड़ ,पौधे ,मनुष्य प्राणी तथा पृथ्वी पर रहनेवाले सभी जिव जंतुओं के जीवन का स्रोत सूर्य ही है । सूर्य को बुद्धि और शक्ति की देवता के रूप में पूजा जाता है। सूर्यनमस्कार भारतीय संस्कृति में जन्मी ५००० साल प्राचीन योगविद्या है,जो सूर्य के प्रति समर्पण ,सन्मान तथा कृतज्ञता के  भाव को दर्शाती है। सूर्यनमस्कार करने से संपूर्ण  शरीर की कसरत हो जाती है ,सूर्यनमस्कार करते हुए सभी आसनों का अभ्यास अपने आप हो जाता है। केवल सूर्यनमस्कार करने से ही शरीर को सभी आसनों का लाभ मिल जाता है। अष्टांग योग में सूर्यनमस्कार का विशेष महत्व है।  प्रत्येक मनुष्य किसी ना किसी ग्रह से अवश्य प्रभावित रहता है। सूर्यनमस्कार का अभ्यास व्यक्ति के शरीर में स्थित सूर्य चक्र को मजबूत करता है ,जिससे अनायास ही साधक ,कई गंभीर बिमारियों से अपने शरीर की रक्षा कर लेता है। सूर्यनमस्कार को आप सूर्योपासना के साथ भी जोड़ सकते है ,ये उपासना मनुष्य को तेजस्वी बनाकर ,व्यक्ति को सन्मार्ग की और प्रेरित करती है। सूर्यनमस्कार को १२ चक्रों में किया जाता है ,इन १२ चक्रों में १ ही चक्र को १२ बार दोहराया जाता है ,तथा इन १२ चक्रों के साथ सूर्य के १२ मंत्रों को जोड़ा गया है ,मंत्रों के साथ किया गया अभ्यास आपके शरीर तथा आत्मा को सकारात्मक परिणाम दिलाता है।  आप चाहे तो इसे ६ ,१२, २१, तथा अपनी शक्ति और योग्यता अनुसार कर सकते है। Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?  इस लेख में आपको सूर्यनमस्कार की पूर्ण जानकारी विस्तार से देने जा रहे है ,इसलिए इसे  ध्यान से पढ़े।
Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?
Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ? 




सूर्यनमस्कार का अभ्यास क्यों करना चाहिए ? Why Should You Practice Surya Namskar



  1. सूर्यनमस्कार एक तीव्र और शक्तिशाली आसनों में से एक है ,इसका अभ्यास त्रिदोषनाशक वात,पित्त और कफ का शमन करनेवाला है। 
  2. ये शरीर के अंगों पर सर से लेकर पैरों की उँगलियों तक अपना विशेष प्रभाव दिखाता है। यह आसन खून के बहाव को तेज करता है तथा बढ़ाता है जिससे पेट ,आतें ,जिगर ,यकृत ,ह्रदय जैसे अंग अपना कार्य सुचारु ढंग से करते है और रोगप्रतिकारक शक्ति को बढ़ाते है । 
  3. जब आप नियमित रूप से सूर्यनमस्कार का अभ्यास करने लगते है ,तो आपको अपने शरीर में कुछ असाधारण से बदलाव महसूस होने लगेंगे ,आपके शरीर एवं दिमाग में पहले की अपेक्षा हल्कापन और उत्साह महसूस होने लगेगा। 
  4. अगर आप किसी कारण आसनों का अभ्यास नहीं कर पातें है ,तो सूर्यनमस्कार आपके लिए एक अच्छा विकल्प है। 





सूर्यनमस्कार का अभ्यास करने से पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें Keep In Mind Before Practicing Suryanmaskar



  1. सूर्यनमस्कार करने का सबसे अच्छा और उचित समय तब होता है ,जब सूर्योदय के समय सूर्य लाल रंग का हो तथा आगे बढ़ रहा हो इसी समय सूर्य का अभिवादन करना चाहिए।
  2.  अगर आप इस आसन को खुली हवादार जगह सूर्य के समक्ष होकर करते है ,तो ये क्रिया आपके तन और मन को और भी प्रफुल्लित और आनंददायी बना देगी। 
  3. सूर्यनमस्कार का अभ्यास करने से पूर्व आपका पेट और आतें खाली तथा साफ़ होनी चाहिए। 
  4. सूर्यनमस्कार का अभ्यास आपके शरीर में उत्साह और जोश भर देता है ,इसलिए शाम के समय इस आसन को ना करे। अगर आप शाम को इस आसन का अभ्यास करते है तो आपको नींद की समस्या हो सकती है। 
  5. शुरुवाती समय में इस आसन का अभ्यास सहजता के साथ बिना शरीर को अधिक ताने करना चाहिए। जब आप पहली बार इस आसन का अभ्यास करते है ,तो किसी योग्य गुरु के सानिध्य में ही इस आसन का अभ्यास करे।



  • आदर्श रूप से आपको रोजाना सूर्यनमस्कार के १२ चक्रों (आवृत्ति) का अभ्यास करना चाहिए बाएं पैर से ६ और दाहिने पैर से ६ इस प्रकार १२ चक्र बनते है ,प्रत्येक चक्र के साथ एक मंत्र  का जाप किया जाता है। परंतु  अगर आप शुरुवाती साधक है तो शुरुवात में आपको ४ चक्रों का अभ्यास करना चाहिए और जैसे आप अपने शरीर को इस आसन के अनुरूप ढाल लेते है ,वैसे आप इन चक्रों की संख्या बढ़ा सकते है।




  • सूर्यनमस्कार के १२ चक्रों के लिए १२ मंत्र


  1. ॐ सूर्याय नमः
  2. ॐ मित्राय नमः
  3. ॐ रवये नमः
  4. ॐ खगाय नमः
  5. ॐ पूष्णे नमः
  6. ॐ भानवे नमः
  7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
  8. ॐ अर्काय नमः
  9. ॐ भास्कराय नमः
  10. ॐ सवित्रे नमः
  11. ॐ मारिचाये नमः
  12. ॐ आदित्याय नमः







  • सूर्यनमस्कार करने की विधि Suryanamskar Steps In Hindi




यहापर सूर्यनमस्कार के १२ क़दमों को  विस्तारित ढंग से समझा रहे है। प्रत्येक आसन का अभ्यास करते समय कम से २० सेकंड  उस अवस्था में बने रहना चाहिए ,इससे शरीर की स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।

  • स्थिति १  -  प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा


प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा
प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा

  • प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा की विधि - चटाई बिछाकर सूर्यनमस्कार की शुरुवात करे ,सबसे पहले चटाई पर सामान्य अवस्था में खड़े हो जाए। अपने दोनों पैरों को एकसाथ जोड़े रखे और ध्यान रखे की आपके शरीर का भार दोनों पैरों पर समान रूप से हो। अब अपने दोनों हाथों को श्वास भरते हुए ऊपर उठाये और छाती को विस्तारित करने का प्रयास करे। अब श्वास को छोड़ते हुए दोनों हाथों को निचे ले आएं और दोनों हाथों के तलवों को एकसाथ जोड़कर प्रार्थना या नमस्ते मुद्रा को बनाएं। इस आसन में अपना ध्यान आज्ञा चक्र यानी भृकुटि में केंद्रित करना चाहिए।





  • स्थिति २ - हस्त उत्तानासन

हस्त उत्तानासन
हस्त उत्तानासन


  • हस्त उत्तानासन करने की विधि - अभ्यास को आगे बढ़ाते हुए ,एक लम्बी श्वास भरे ,और हाथों को ऊपर उठाकर अपने शरीर को पीछे की और तानने का प्रयास करे। शरीर को पीछे झुकाते समय छाती एवं कमर को फैलाने का प्रयास करे। इस आसन में अपना ध्यान विशुद्ध चक्र पर केंद्रित करे।





  • स्थिति ३ - पाद हस्तासन

पाद हस्तासन
पाद हस्तासन


  • पाद हस्तासन की विधि - श्वास को बाहर निकालते हुए ,अपनी कमर को आगे की और मोड़े और अपने   हाथों को निचे ले जाए तथा जमीन से स्पर्श कराये। निचे झुकते समय ध्यान रखे की मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी ) और घुटने सीधे हो। ये आसन उत्तानासन के नाम से भी जाना जाता है। इस अवस्था में अपना ध्यान नाभि पर यानी मणिपुर चक्र पर केंद्रित करे।





  • स्थिति ४ - अश्व संचालन आसन

अश्व संचालन आसन
अश्व संचालन आसन


  • अश्व संचालन आसन विधि -श्वास भरे तथा अपने बाएं पैर यथाशक्ति पीछे ले जाए। अपने दाहिने पैर को घुटने से मोड़े रखे ,दोनों हाथों को जमीन से सटाकर बगल में रखे तथा दृष्टी को सामने बनाये रखे। इस अवस्था में अपना ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।





  • स्थिति ५ - पर्वतासन

पर्वतासन
पर्वतासन


  • पर्वतासन की विधि - श्वास छोड़ते हुए अपने शरीर का वजन दोनों हाथों पर रखकर दाहिने पैर को भी पीछे की और ले जाए। तथा बाएं पैर की समान्तर रेखा में रखे। अब अपने कूल्हों को ऊपर उठाये तथा गर्दन को अंदर की और ले जाए। जब आप ऐसा करे तो  ध्यान रखे की पैरों के तलवे जमीन से सटे होने चाहिए। अपनी आखों से अपनी नाभि को देखने का प्रयास करे ,आपके शरीर की आकृति बिच में से उठी हुयी, पर्वत के समान दिखने लगेगी। इसे अधोमुख श्वानासन के नाम से भी जाना जाता है। इस अवस्था में अपना ध्यान सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।





  • स्थिति ६ - अष्टांग नमस्कार

अष्टांग नमस्कार
अष्टांग नमस्कार


  • अष्टांग नमस्कार विधि - श्वास को छोड़ते हुए घुटनों को फर्श पर ले जाए ,तथा अपने कूल्हों को थोड़ा ऊपर उठाये। ठोड़ी,छाती एवं घुटनों को जमीन पर टिका कर रखे। इस आसन में शरीर के आठ अंग जमीन का स्पर्श करते है। इस अवस्था में अपना ध्यान अनाहत चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।







भुजंगासन
भुजंगासन


  • भुजंगासन की विधि -अब शरीर को आगे की और झुकाकर पैरों को सीधा रखे। छाती ,गर्दन तथा नाभि के ऊपर के भाग को ऊपर की और करे तथा कमान देकर भुजंगासन की मुद्रा बनाये। जब आप ऐसा करते है ,तो कोहनियों को मोड़ कर ही रखे। इस अवस्था में अपना ध्यान मूलाधार चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।[  पढ़े - भुजंगासन के लाभ  ]






  • स्थिति ८ - पर्वतासन

पर्वतासन
पर्वतासन


  • पर्वतासन की विधि - अब श्वास को छोड़ते हुए अपने कूल्हों को ऊपर उठाये तथा अंदर की और नाभि को देखने का प्रयास करे। इस अवस्था में अपना ध्यान सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित करना चाहिए । इस स्थिति को अधो मुख श्वानासन के नाम से भी जाना जाता है।  






  • स्थिति ९ - अश्व संचालन

अश्व संचालन
अश्व संचालन


  • अश्व संचालन की विधि -  श्वास को भरते हुए ,बाएं पैर को आगे लाकर घुटने से मोड़ कर रखे ,तथा दाहिने पैर को पीछे की तरफ रहने दे। इस स्थिति में जितना आप पीछे झुक सकते है ,उतना झुकने का  प्रयत्न करे। इस अवस्था में अपना ध्यान विशुद्ध चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।






  • स्थिति १० - पाद हस्तासन

पाद हस्तासन
पाद हस्तासन


  • पाद हस्तासन की विधि - श्वास को बाहर छोड़ते हुए दाहिने पैर को भी आगे ले आये और खड़े हो जाए। घुटने एवं मेरुदंड सीधा रखे तथा हाथो को जमीन से सटा कर रखे। इस अवस्था में अपना ध्यान मणिपुर चक्र पर केंद्रित करना चाहिए । 






  • स्थिति ११ - हस्त उत्तानासन


हस्त उत्तानासन
हस्त उत्तानासन


  • हस्त उत्तानासन की विधि - श्वास को भरते हुए ,दोनों हाथों को ऊपर उठाकर पीछे झुकने का प्रयास करे ,तथा छाती एवं कंधों को पूर्ण प्रसारित करे। इस अवस्था में अपना ध्यान विशुद्ध चक्र पर केंद्रित करना चाहिए ।






  • स्थिति १२ - प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा

प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा
प्रणाम आसन या प्रार्थना मुद्रा


  • प्रणाम आसन की विधि - श्वास को सामान्य रूप से लेते रहे ,तथा अपने दोनों पैरों को जोड़े। दोनों हाथों को वापस सामान्य स्थिति में लाये तथा नमस्ते मुद्रा बनाये। अपने शरीर को सीधा रखे तथा झुककर सूर्य को प्रणाम करे। इस अवस्था में अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर केंद्रित करे।



  • यह एक सूर्यनमस्कार की १२ स्थितियों का उल्लेख किया है। यह सूर्य नमस्कार का एक चक्र पूर्ण हुआ ,इसीप्रकार पैरों को बदलकर आप १२ चक्रों को पूर्ण कर सकते है। जैसे किसीने १ ले चक्र में अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाया हो तो दूसरा चक्र करते समय उसे अपना बायां पैर आगे बढ़ाना चाहिए।



  • सूर्य नमस्कार का अभ्यास किसे नहीं करना चाहिए | Who Should Not Practice Surya Namaskar?



  1. जो महिलाये गर्भवती है उन्हें सूर्य अभिवादन नहीं करना चाहिए। वैसे ही महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान भी सूर्यनमस्कार से बचना चाहिए।
  2. पीठ या गर्दन से ग्रसित व्यक्तियों को इस आसन का अभ्यास चिकित्सक (डॉक्टर) के परामर्श अनुसार करना चाहिए। 
  3. अत्यधिक गर्मी ,उच्च रक्तचाप या हर्निया से ग्रसित व्यक्ति सूर्य नमस्कार का अभ्यास ना करे। अति दुर्बल तथा कमजोर व्यक्ति इसका अभ्यास ना करे।






  • सूर्य नमस्कार के लाभ Benefits Of Surya Namaskar


  1. सूर्यनमस्कार एक बेहतरीन और लाभदायी आसनों में से एक है ,इसके लाभ भी अनंत है।  सूर्यनमस्कार का अभ्यास तेज गति से करने से शरीर में स्थित अत्यधिक वसा (चर्बी) जलने लगती है ,इसके प्रभाव से सूर्य चक्र मजबूत बनता है तथा जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है। 
  2.  यह वजन कम करने ,पाचनतंत्र को सुधारने और हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए बहुत ही उपयुक्त आसन है।
  3.  आप जब लगातार इसका अभ्यास करते है तो श्वसन क्रिया तेज हो जाती है। जिससे खून का बहाव बढ़कर अत्यधिक मात्रा में शरीर को ऑक्सीजन मिलता है ,और श्वसन संबंधी समस्याएं दूर हो जाती है। 
  4. यह आसन फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाता है तथा अधिक से  अधिक शुद्ध प्राणवायु को खून में प्रवाहित करता है। 
  5. यह आसन शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को बाहर निकलता है।  सूर्य अभिवादन वात,पित्त और कफ तीनों दोषों को दूर करने सक्षम है।
  6.  मासिक धर्म की अनियमितता ,तथा प्रसव के समय पीड़ा होना इत्यादि को यह आसन दूर करता है। पर इसके लिए आपको इसका नियमित रूप से अभ्यास करना आवश्यक है ,वो भी गर्भधारणा से पूर्व ,गर्भवती होने के बाद इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। 
  7. नियमित सूर्य अभिवादन यौवन को बनाये रखता है ,ये शरीर कांतिमय तथा तेजस्वी बनाता है। इसके अभ्यास से आँखों की रौशनी तेज होती है तथा बाल झड़ना ,असमय बालों का सफ़ेद होना इत्यादि समस्याओं के लिए ये बहुत चमत्कारिक आसन है। 
  8. यह झुर्रियों को कम करता है तथा चेहरे को निखारता है। थॉयरॉइड ग्रंथि पर ये विशेष प्रभाव दिखाता है ,इसलिए जिन्हे हाइपोथोरॉइडिस्म की समस्या है ,उन्हें  इस आसन का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
  9.  नित्य सूर्य नमस्कार का अभ्यास मस्तिक्ष की कार्यक्षमता को बढ़ाता है ,स्मरणशक्ति को विकसित करता है तथा  दिमाग को तिष्ण बनाता है।
  10.  सूर्यनमस्कार का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को ,बुद्धि से कोई पराजित नहीं कर पाता।  यह आसन दिमाग को शांत और तनावरहित बनाता है तथा आयु में वृद्धि करता है।   
  11. नियमित सूर्यनमस्कार का अभ्यास व्यक्ति के रोग ,दोष और विकारों का नाश करता है तथा निष्ठां ,विनम्रता ,धैर्य ,स्थिरता ,कठोरता ,निश्चलता ,उत्साह ,निर्भीकता जैसे गुणों को उजागर करता है।

आशा करता हूँ ,की आपको "Surya Namskar | सूर्यनमस्कार कैसे करे ,और इसके लाभ क्या है ?" की सटीक जानकारी प्राप्त हो गयी होगी। नियमित अभ्यास द्वारा आप इसके सकारात्मक लाभ प्राप्त कर पाएंगे।





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